"मणिकर्णिका-झाँसी की रानी"
नवम्बर 1828 वाणारसी में एक कन्या ने जन्म लिया, चंचल,निडर ,साहसी छबीली को मणिकर्णिका नाम दिया, बचपन से ही सीख रही थी घुड़सवारी,तीर,तलवार। काली बन कर के करती थी अंग्रेजो का वो संहार, झाँसी पर जब अंग्रेजो ने अधिकार जमाना शुरू किया, लोगो को बेबजह सताया सत्ता पर षड्यंत्र किया, ब्याह हुआ गंगाधर से तब मणिकर्णिका झाँसी आयी, सन 1842 में मनु बनी रानी लक्ष्मीबाई, खुशियो में डूबे झांसी को रानी ने जब हकदार(वारिश) दिया, रूठी हुयी नियति ने वो भी झांसी से छीन लिया, सदमा लगा महाराज को गहरा, फिर रहा नही सांसो पे पहरा, अनाथ हुई झांसी लोगो में मायूसी सी छायी थी, राज्य हड़प नीति की बिसात अंग्रेजो ने फिर बिछायी थी, बिलंब न करते हुए रानी ने सिंहासन को थाम लिया, सहमी-डरी हुयी प्रजा को एकजुटता का सन्देश दिया युद्ध के लिए रानी ने महिला दल का गठन किया, 1857 की क्रांति का बिगुल यही से फूंक दिया, लड़ते लड़ते रणभूमि में वीरगति को प्राप्त किया, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का यही से आगाज किया, मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों को न्योछावर किया, "अपनी झाँसी नही दूंगी" ऐसा एक उदघोष किया।। -इ० यशवन्त दुबे