पालघर मोबलिंचिंग
व्यथित हुआ मन देख कर हिंसा संतो पर,
संत त्याग देते इच्छाएं सारी मन रहे बस प्रभु पर,
प्रभु की तलाश में जो घूमते है इस धरा पर,
जो करते काम अहिंसा के बनाते है देश को सुंदर,
उस सन्त को मारा तुमने किस अपराध से,
क्या ले लिया उसने तुम्हारा या निज स्वार्थ से,
अगर स्वार्थ भी हुआ तो क्या तुम जान ले लोगे,
नफ़रत भी अगर है तुमको तो क्या प्राण ले लोगे,
साधु अवग्या का फल भी तुम सह न पाओगे,
यह क्रूर कृत्य करके क्या तुम बच जाओगे,
अरे कहा कभी कोई बच पाया साधु के श्राप से,
फिर तुमने कैसे सोच लिया कि बच जाओगे इस घोर अपराध से,
कोई नही बचा पायेगा चाहे जोर लगाओ जितना,
जितना उसने सहा था उस दिन सहना पड़ेगा तुमको उतना,
उस भीड़ में केवल उनका एक सहारा खाकी थी
तुमने भी हाथ झटक दिया
तोड़ दी जो आखरी आस बाक़ी थी
तुम भी गुनहगार हो उस भीड़ के संग में,
बदनाम किया खाकी को
रंग लिए हाथ उनके खून के रंग में,
भीड़ में जाके मरोगे तो क्या बच जाओगे,
इन अवसरवादी सरकारों के पीछे भी गर छिप जाओगे,
पर इस कालचक्र के प्रभाव से तुम बच न पाओगे,🙏🇮🇳
-इ० यशवन्त दुबे 'मयंक'
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